अष्टिम्की / कृष्णाष्टमी

१८ फाल्गुन २०७७, मंगलवार Hits : 449
अष्टिम्की / कृष्णाष्टमी

-रबिनाचौधरी
(धनगढी)

अष्टिम्की तिहुवार थारु समाज मे मनैना धेउरे तिहुवार मनसे यी फेन एकथो भारी तिहुवार हो । जौन खास कैक जन्नी मनै मनैति आइल बतैं । अष्टिम्की तिहवार भगवान कृृष्ण के जन्म हुइल पाछे से शुरु हुइल कहके सहजिल्ले अनुमान लगाई सेकजाइथ । अष्टिम्की तिहुवार जातजाति, ठाउँ अनुसार फरक फरक तरतरिका से मनाइत देखजाइथ ।

ओसतेक थारु समाज मे फेन आपन रहन सहन अनुसार मनैति आइल बतैं । थारु समाज मे अष्टिम्की के आघेक रात मुर्गा बोल्ना से पहिले कुतना जुन दर खैना चलन बा । अष्टिकी रहे चाहुइया सब जे मुर्गी बोल्ना से पहिले मेरमेराइक मिठमाठ पकाके खा पिके के सेकेपरथ, जिहिन दर खैना कहजाइथ । अगर कोई मुर्गी बोलल पाछे कुछ खैथैं कलेसे दुथेहरु मानजाइथ तबे उहिन से पहिले खैना चलन हमार थारु समाज मे चल्ति आइल बा । मुर्गी बोल्थैं तब से अष्टिम्की मनेकी कृष्णाष्टमी शुरु हुइथ ।अष्टिम्कीक बिहन्नेसे भुखले रहल जन्नी मनै दोना टेपरी छेदना काम करथैं ओ थारु मनै एकथो घरेक भित्तामे चहा देहरिम अष्टिम्की तिकना,पूजा करना चित्र बनैथै जमन

कान्हा,कुुकरा,दिन,पाँचपाण्डप,डोली,बनुवा,मन्जोर,जोन्हया,कौरव,रौनीमछरिया,मकैक थोंथा,बन्दर,हरजोता मनिया,खेतुवा,बिछिया,मुर्गा,ऊँत,घोरवा,लाउ,राम ओ सीता,हाँथी,रोइना,ओ आउर चिज के फे चित्र बनाइल रहथ ।

जब सन्झन्या हुइथ गैया करयैना जुन तब भुखले रहल सबजे लव्वा लव्वा धोती ,लेहङगा,चोलीया,अघरान पार के सोला सिंगार कैके अष्टिम्की तिके जैथैं। ।तथियामे चाउर,खिरा,कुन्धरु,निमुवा,ओ मातिक दिया बार के पूजा पाठ करना ओ गित गैना चलन बा जिहिन अष्टिम्की तिकना कहजाइथ । अ‍ैसिक तिकके सेकके आपन आपन घरेम गोबर पानीसे चोखा बनाइल ठा“उमे सक्कुजे बैठके कन्डीक आगीमे सर्री ओ घिउ के धुप बनाके ओ खैना सक्कु मेराइक परिकार एक चुटिन चिकुट चिकुट दारे परथ । ओ ओक्रे संगे शुद्ध पनीसे दाहिन बा“उ कैके जल पर्छना ओ अपन माग पूरा होए कहिके भगवान कृष्णसे कामना करथैं । यैसिक पूजा पाठ कैके सेकके खैनासे पहिले कुछ भाग आपन दिदी बाबुनके लग अल्गे कहारे परथ । जौन भोज हुइल छाई वित्या हुक्रन ‘‘अग्रासन’’ के रुपमे देहेना चलन चल्ती आइल बा ।

पूजापाठ कैके खा पिके सेकके फेन दोस्रे सबकोइ अष्टिम्की टिकल घरेमे अष्टिम्कीक गीत गाइ जैना चलन बा । अष्टिम्कीक टीका से शुरु हुइल पाछे जाके सखिया नाचमे पूरा हुइथ । यी गीतमे श्री कृष्ण भगवानके महिमा गाजाइथ ।

दोसर बिहानके सक्कर्ही टीकल समान सक्कु चीज लैके लग्गे रहल लदीया या दुन्द्रामे अस्राइ जाई परथ । अ‍ेसिक बहतीरहल पानीमे अस्रैलेसे गा“उ समाजमे रहल सक्कु रोग व्याधी पुहके चलजाइथ कना जन विश्वास फे रहति आइल बा । अस्राके लहाखोरके गोबर पानीसे चोखा बनाइल ठा“उमे बैठके कन्डीक आगीमे सर्री ओ घिउ के धुप बनाके ओ खैना सक्कु मेराइक परिकार एक चुटिन चिकुट चिकुट दारे परथ । ओ ओक्रे संगे शुद्ध पनीसे दाहिन बा“उ कैके जल परछके पूजापाठ कर्ना चलन बा । सक्कु परिकार खैनासे पहिले अपन छाइ बितियनके लग कहारके तब जाके किल पेट भरके खैना चलन बा जिहिनहे फरहार कैना कहिजाइथ । फरहार करेबेर धेउरे परिकारके संगे सिध्रा टीना अनिवार्य हुइपरथ कना चलन बा ।

फरहार कैके सेकके भोज हुइल अपन छाइ बिट्यान हे ‘‘अग्रासन’’ देहे जैना चलन चल्ती आइल बा हमार थारु समाजमे ।

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