बर्खाके समयमे ढह्रिया

१८ फाल्गुन २०७७, मंगलवार Hits : 393
बर्खाके समयमे ढह्रिया

परम्परागत शैलीमे आधारित हमार थारु समाजमे अभिन टक तमान शैली सीप विद्यमान बा । पुर्खा पुरनियासे चल्टी आईल तमान मेरिक सीपके काम हमार समाजमे बहुट बा । अपनठन रहल सीप ज्ञानशैलीहे प्राथमिकता देटी हमार थारु पुर्खाहुक्रे बहुट मेराईक चिज बनैले बाटै । जौन काम बहुट सकारात्मक फेन बा । ओस्तके हमार थारु समाजमे पहिलसे चल्टी आईल काम ढह्रिया, बरेरुवा, डिलिया, गेड्ली जैसिन परम्परागत चीज बनैना काम एक हो ।

हमार थारु समाज पहिले अशिक्षित हुईलेसे फेन बहुट ज्ञानसीप शैली रहे । ओ अभिन टक तमान सीपशैली चल्टी आईल बा । आपन खेतीपाटी घर परिवार, घरके कामकाज जिम्मेवारी निभैटी आईल थारु पुर्खाहुक्रे खाली समयमे आपन सीपशैलीके विकास करटी अईलै । गाउँ घरमे खेटीपाटी सेकके कुछ दिन पाछे धान फेन पनैना हुईठ् । तब उ काम सेकके खाली समय रहठ् । लेकिन खाली समयके फोकटिया बैठ्नासे मजा टे आपन सीपशैलीहे आगे बढैना कामहे मजा मन्टी हमार थारु समाजमे फेन बहुट सीपशैली बा । जस्तेकी खेतीपाटी सेकके जन्नी मनै ढकिया, देलुवा, भौंका बिन्ना, घरके चुला चौका हेरना, घर परिवार हेरना काम करैं । ओस्तके थारु मनै यी बर्खा छेक आपन गोरु भैंस हेरना काम थारु मनै करैं । ओकर साथ साथे उ समयमे मच्छी बझाईक लाग ढह्रिया, बरेरुवा ओस्तके डिलिया, गेड्ली, हेल्का, जाल बनैना काम करैं । ओस्तके खाली समयमे प्रयोग करटी सीपमूलक काम सिख्लै ओ सुरुवात करलै पुर्खाहुक्रे । यिहे सीपशैलीके डौरानमे ढह्रिया बनैना काम फेन बहुट बड्वार शैलीकला हो । आजकाल बर्खाके समय पहिले गाउँघरमे टिनाटावन कुछ नाई रहे । पानी अईना कारणसे बारीमे टिना लगैलेसे फेन एकदम कम मात्रामे टिना होए । पानी परल बेला बर्खा छेक मच्छी मरना फेन अप्थ्यारो हुईना । कबु टे मच्छी मरना पानी ठिक्के हुईलेसे मच्छी नाई मिल्ना समस्यासे छुटकारा पाईक लाग पुर्खाहुक्रे ढह्रिया, बरेरुवा बनैलै । आपन गाउँमे रहल बाँस, बनकस ओस्तके चाहल अनुसार कच्चा पदार्थ जुटैटी बर्खाके समयमे पुर्खाहुक्रे सहजुलसे मच्छी प्राप्त करे सेक्ना जुक्ति बनैलै ।

ढह्रिया बहुट मेहनतसे बन्ना चीज हो । ढह्रियासे टे सायद पक्का फेन हम्रे एकदम परिचित बाटी । आवश्यकता अनुसार समान जुटाके ढह्रियाहे बहुट अजिब अनौठो तरिकासे बनाईल रहठ् । सबसे अजिब बात टे यिहो कि ढह्रियामे मच्छी पैंठ्ना डगरहो ‘गाँवा’ । यी गाँवा अईसीन तरिकासे बनाईल रहठ् कि यी डगर मच्छी टे जाई सेक्थै लेकिन घुमके फिर्ता आई नाई सेक्थै । ढह्रियामे बझाल मच्छी करिब तीनचार दिन सम नाई झरबो कलेसे फेन ओम्नक मच्छी तमान जिट्टी रथै । ओ बर्खाके समयमे ताजा मच्छी पैना श्रोत ढह्रिया हो । ढह्रियाके बनावट ओ आकार देना बहुट कलात्मक काम हो ।

ओस्तके ढह्रियामे मच्छी बझैना लेकिन ओईनहे झारेक लाग कौना साधन फेन चाहल । तब ढह्रियामे बाझल मच्छी झर्ना बनैलै डिलिया ओ गेडली फेन ढह्रियाके साथ साथे बनाईल चीज हो । डिलिया गेडलीफेन आपन शैली अनुसार मेरमेराईक बनाई सेकजाईठ् । कोई डिलिया गुलियार लम्मा बाहर पाँजर फुलल् रहठ् कलेसे कौनो डिलिया गुलियार लम्मा किल रहठ् । गेडली टे बिना घेँचाके डिलिया हो ।

अईसीक हमार मच्छी बझैना मच्छी ढरना साधन पुरा हुईल । आब बाझल मच्छी ढह्रिया लगाईल ठाउँसे झारके घरे लानके टिना बनैना तयार करे सेकजाईठ् । अईसीक बाझल मच्छीनके टिना काम करटी आईल बाटै हमार थारु पुर्खा । ओस्तके कबु ढह्रियामे ढेउर मच्छी बाझल बेला सुखुवाके सिध्रा पकलीमे छुट्याई सेकजाईठ् । यी सुखुवाईल मच्छी बिशेष कैके दशै देवारी ओ धानकट्नी छेकके लाग आपन बनाईल भाँरा गग्रीमे जम्मा करटी अईलै पुर्खाहुक्रे । दशै देवारीमे आउर धान कट्नी छेकमे विशेष तरिकासे राहरंगी करके खैना परिकार हो । ओ यि बेलामे फेन ढह्रियासे बाझल मच्छीनके विशेष भूमिका रठिन् । पहिले पुर्खाहुक्रे मच्छीन मनसे मिल्ना वास्तविक फाईदा नाई जन्ले रहिट । मने तब फेन सन्तुलित खाना बनाके खैटी अईलै । मच्छीन मनसे हम्रहीन हमार शरीरहे आवश्यक पोषण तत्व भिटामिन, प्रोटिन, खनिज मिलठ् मने मच्छी खाई पैबी कलेसे ज्यादा खाई नाई परठ । ठिक मात्रामे मच्छी खैलेसे हम्रहीन हेग्नी पोक्नी नाई लागठ् । जब धेउर मच्छी खैबो तब जाके अईसीन समस्या देखा परठ् ।

जब हम्रे बहुट धेउर मच्छी खालेबो । तब ओईनमे रहल तत्व हमार पेटमे हाईड्रो क्लोरिक एसिड टुक्रा टुक्रा पारे नाई सेकठ् । ओ शरिरमे आवश्यक चीज हमार रकतमेृ फृन नाई मिलठ् । खाईल मच्छी नाई पचके बिना काम लग्ले बाहर निकरजाईठ् । ओहे हो हमार समस्या मच्छी खाके हेगनी लग्ना । ओहे कारणसे हम्रे एकदमै ठीक मात्रामे मच्छी खाईक परठ् । ता कि हमार पेट उहीहे पचाई सेके । ओहे कारणसे घरमे पुर्खाहुक्रे धेउर मच्छी खैनासे मना करठै । ओ बाँकी मच्छी सुख्वा देथै ।

अब्बेके समयमे अईसीन परम्परा लोप हुईटी जाईटा । आजकल टे ढह्रिया बरेरुवा, डिलिया गेडली जैसिन परम्परागत शैलीके चीज देख्ना मुश्किल परठ् । यहाँसम कि यी बनाजैना काम फेन एकदमै कम मात्रामे करजाईठ् । अब्बेके समयमे थारु समाजमे रहल परम्परागत शैली सीपके चीज बहुट कम बा । जस्ते कि हुक्का टे पूर्ण रुपमे लोप होसेकल बा । ओस्तके आपन हाथसे बनाईल पुर्खाहुक्रनके पौवा फेन हुक्काके जस्ते अवस्था बाटिस ।

तबम मारे अईसीन पुरान चीज बचाके ढरे परना ओस्तके यकर शैली फेन आगे बढाई परना एकदमे जरुरी रहल बा । थारु समाजमे पहिले टे तमान मेराईक रितिसंस्कृति सीपशैली रहे । ओस्तके पहिलेके सकारात्मक चीजहे बचैटी हमार थारु समाज हे सकारात्मक रितिरिवाज, सीपशैलीके समाज कहिके परिचित कराई पर्ना बा ।

श्रीधर चौधरी पहलमानपुर,

कैलाली हालः कैलाली मोडल कलेज धनगढीमे अध्ययनरत

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