सनेश

खिस्सा / बट्कुही ३ बैशाख २०७८, शुक्रबार Hits : 231
सनेश

सनेश
बिहन्नी भुटियाहे हुँकान टोलके काकी ससुइया फौगनी अंगनामे आके कहलीन, ‘मोर पटोहिया सोम्मार लैहर जाइटा । टै फेन पठाइ जा । उहे कहे आइल रहुँ ।’ अत्रा कहिके पितिया ससुइया (काकी ससुइया) चलगिली । भोजके बाद पहिलचो दुलहीहे पठाइ जउइया मनै सनेशके पहुरा (कोसेलीके पोका) डेहेपरठ । सनेश लेके उहाँकसँग उहाँक् लैहर पठाइ जाइक परठ । फौगनीके पटोहिया भोजके बाद पहिलचो लैहर जाइटही । भुटियाके छाइ दुरागमणमे (गौणा) फौगनी मुङवा (बेसनके लड्डु) ओ जिलेबी सनेश डेले रही । कोइ मिठाइ सनेश नैडेहल बेलामे भुटियाके छाइक् दुरागमणमे फौगनी मिठाइ सनेश डैके फौगनी भुटियाके इज्जत बचैले रही । उहाँ फौगनीके गुण नैबिस्राइल हुइटी । यिहे गुणके कारण उहाँ फौगनीके पटोहिया लैहर जैना दिन सनेशके पोका लैके पठाइ जैना निर्णय लेली ।

लावा भोज्ही डुल्हनियाँ सस्रारसे पहिलचो लैहर जाइबेर सस्रारओरिक छिमेकी ओ आफन्तहुक्रे अपन अपन घरसे पहुरा बनाके डुल्हनियाँसँगे उहाँक लैहर डुल्हनियाँहे पठाइ जैठैं । पठाइ जाइबेर ढकिया ओ पेटीभर पहुरा (कोसेली) डेनाहे मोटा डेना कहिजाइठ । मोटा डेहेपरी कहिके प्रत्यक्ष रुपमे डुल्हनियँक ससुइयाससुरवा छिमेकी ओ आफन्तहे नैकठैं । दुल्हनियाहे पठाइ जैनाबा कहिके किल कठैं । पहिलसे चलटी आइल चलन होके हुइ पहिलचो पठाइ जाइपरठ कहलमे पहुरा डेहेपरठ कहिके अप्नही बुझ्ठैं सक्कु छिमेकी ओ आफन्तहुक्रे । नैबुझलमे पुछ्ठै फेन मोटा फेन पठैना
हो ? हो, कहलमे पहुरा डेहेपरी कहिके बुझ्ठैं । फौगनी लग्गेक छिमेकी ओ आफन्तहुकनहे किल पटुहियाहे पठाइ जाइ परना बा कलेरही । फौगनीके लग्गेक छिमेकीमे भुटिया फेन परल रहि ।

पुठाइ जाइपरी कटिकिल भुटिया फेन बुझ्ली सनेशके मोटा डेहेपरी । भुटियाके लैहर वीरनगर गाउँमे रहे । उहाँहे सबजे वीरनगरनी कहिके बलाँइट मने टोलमे उहाँ सक्कु जन्नी मनैनसे बाँठा हुइल ओरसे उहाँहे भुटिया कहिके सब बलाँइट । बाँठा मनैन्हे थारु भाषामे भुटिया फेन कहिजाइठ टबेमारे उहाँहे फेन भुटिया कहिट सबजे । टोलके मनै उहाँहे भुटिया कहिके बलाइबेर उहाँ कबु आपत्ति नैजनैली ।

असारमे फौगनीके छावाक् भोज हुइल रहे । साउन महिनामे डुल्हनियाँहे लैहर पठैना दिन पण्डितसँग डेखैले रहि । टोलके छिमेकीहुँकनसे भुटियाक् आर्थिक अवस्था कमजोर रहे । भुटियाके घरके आर्थिक अवस्था फौगनीहे फेन पता रहे । मने, सामाजिक चलनहे फौगनी टेरे नैसेक्ली । आर्थिक अवस्था कमजोर रलेसे फेन भुटिया फौगनीके बाट सुनके बर खुस हुइली । उहाँहे फोही लागल । उहाँ खुसीसे हावा जस्टे हलुक हुइल रहि । उहाँ पुजाइबेर लाल रङके सारी, हरियर चुरिया, लाल गुरिया ओ पियर फिता रहल बाटा चप्पल घालके डुल्हनियाँहे पठाइ जैना बाट समेत सोचसेकले रहि ।

सावन महिना रहे । सावन महिना खेती करना महिना रहल ओरसे प्रायःजैसिन गाउँमे धनी मनैन्के बाहेक सबके घरमे अन्न पानी अन्तिम अवस्थामे रहे । भुटियाके घरमे फेन अन्न पानी अन्तिम अवस्थामे रहे । घरमे एक बोरा उसिना चामल किल रहे । सनेश किनके डेना पैसा नैरहे । अपन घरसे सनेश बनाके डेहेक लाग घरमे गोहुँ ओ अरुवा (मसिना) चामल नैरहे । सावनके अन्तिम अँठ्वार रहे । भदौमे पक्ना मेरिक वैशाखमे लगाइल औस (भदौहा धान) पाकल नैरहे । औस काटके सुखवााके चामल बनाके पिठा पिसाके पिठारके (चामलके पिठा) तेलपौर (तेलमे पकाइल रोटी) रोटी बनाके दुल्हनियाहे सनेश डेना उहाँ विचार करली । उहाँ औस लगाइल खेतुवा गिली ।

खेतुवामे औस पक्ना अवस्थामे रहे, मने पाकल नैरहे । औरे दिन उहाँ हँसिया लेके फेन खेतुवा गिली । मेरुवामे डह्रिली । औसके बाली अपनओर टन्ली । बालीसे एक धान टुरली । मुहमे धान डरली । दाँतसे धान कट्ली । धान पाकल जस्टे लागल । उहाँ फेन धान मुहमे डरली । दाँतसे फेन कट्ली । उहाँ धान पाकल सम्झली । उहाँ एक बोझा धानके झट्टा (जरसे धान कट्ना) कट्ली । उहाँ झट्टाके बोझा बोकके घर अइली । उहाँ रातके बेरी खाके धानके बोझा खोलली । ढिरेसे झट्टाके धान उहाँ गोरले मिस्के झरैली । धान झराके पैरा गोरुहे खुवाइक लाग ढरली । धान सुप्पामे फटकली । धान फटक्के ढकियामे ढरली ।

उहाँ डुसर दिन बिहान घाममे धान सुखैली । एक घाम सुखाके ढरली । तीन घाम सुखाके बल्ल चाउर बनी कहिके उहाँ धान हेरके अनुमान लगैली । उहाँ डुसर दिन फेन धान घाममे सुखे डेली । धान सुखाके साँझके ढरली । साउन महिना रहे । जबफेन फेन पानी आइ लग्ना । पानी पर्ना ठेगान नैरहे । एक्केघरी बद्री लागे पानी बर्से लागे । मध्य रातमे मेघ गर्जे लागल । भुटिया गहिर निन्दमे रहि । बाज मारेवाला बिजली चम्के लागल । गड्याङुगुडुङ् करटी मेघ गर्जे लागल ।

मेघ गजरट सुनके भुटिया उठ्ली । उठके अंग्नामे रहल काठी, गुँइठा, पैरा भित्तर ढरली । ओसरहवामे रहल गोन्द्री भित्तर ढरली । दुई घाम सुकाइल धान उहाँ भान्सा घरके कोनुवाँमे ढरले रहि । उहाँ धान गोनैरसे छोप्ली । उहाँ सब काम ओरवाके सुते गिली । बिजली चम्कटी, मेध गर्जटी झमझम पानी आइ लागल । पानी झमझम परेबर चारुओर सित्तर हुइल । भुटियाके मिठो निन्द परल ।

जब बिहान उठ्ली । उहाँ डेख्ली भान्सा घरके छप्रा चुहके गोनैरसे छोपल सुखाके ढरल सब धान भिजगिल रहे । उहाँ गोनैर हटाके धान हेरली । धान पुरै भिजल रहे । धान भिजल देखके उहाँ बरा निरास हुइली । उहाँ बसघरासे ढकिया नन्ली । ढकियामे धान ढरली । धान भिजके उहाँक हातमे चप्टल । उहाँ ढाकीमे धान ढारके पानी नैचुहना ठाउँओर ढकिया सरली । पानी अइना बन्द हुइना कौनो लक्षण नैरहे । लगाटार ४ दिन पानी आइल ।

पानी आइट देखके भुटिया चिन्तामे रहि । डुल्हीहे पठाइ जैना दिन आब दुई दिन किल बाँकी रहे । अइसिन बेलामे किहिनसे चाउर सापट मँग्ना ? चाउर सापट मग्लेसे छिमेकी जम्मा हुके बाट लगाइटे, फलानेक खाइ नैपुग्ठीस, चिलाने धान, चाउर सापट मागे आइल रहे । छिमेकीके खासखुस सुनासे उहाँ चुप लागके बैठ्ली । किहुनसँग कुछ सापट मँग्ना विचार करली ।

एक हप्तापाछे बल्ले पानी रुकल । दिनके चिरंगन घाम लागल । उहाँ अंग्नामे गोनैर (पैरक गोन्द्री) बिछाके एक हप्ता आघे भिजल धान घाममे सुखाइ डेली । भिजल धान, ढकियामे ढरके धान ढुसी परके ढेल्का परगिल रहे । ढेल्का फुटाके ढुसी परल धान उहाँ सुखे डेलिन । दिनभर चिरंगन घाम लागल । दिनभर घाममे धान सुखैली । उहाँ साँझ मिलमे धान कुटाइ गिली । मिलमे धान कुटाइबेर टुक्राटुक्री खुदीजस्टे चाउर निक्रल । चोर खुदीजस्टे ओ टरे करिया रहे । चाउर सनेश डेना नैरहे टबे उहाँ ढुक्क हुइली । उ चाउरेक पिठा पिसाके तेलपौर रोटी ओ खिर सनेश डेना रहे । धान कुटाके घर नन्ली ।

डुसर दिन चाउर केराके एक किलो सम चाउर खिर बनाइक लाग ढरली । बाँकी चाउरेक पिठे पिसाइ मिल गिली । पिठा पिसाके नन्ली । चाउर करिया हुइलेसे फेन पिठा उज्जर निक्रल । काल्ह सनेश बनैना दिन रहे । फौगनीके पटोहियाहे सनेश बनाके लैहर पठैना दिन रहे । भुटिया दिनके खाना खाके तेलपौर रोटी बनाके बैठ्ली । टाटुल पानीसे चाउरेक पिठा सन्ली । पहिले खिर बनैली । खिरमे उहाँ ल्वाङ ओ सुकुमेल सिलोटमे पिसके डरली । ल्वाङ पिसके डारल खिर ठोरचे करिया हुइल । खिर करिया हुइल देखके उहाँ डरुवामे एकचुटी खिर सेरुवाके चिख्ली । खिर उहाँहे तित लग्लीन् । उहाँ मनमने विचार करली, ढेर ल्वाङ डारके खिर तित हुइल हुइ । खिर बनाके भान्साघरमे ढरली ।

सानल पिठक तेलपौर रोटी बनाइ लग्ली । कराहीमे तेल डरली । बरटीरहल गुँइठा ओ काठी चुल्हा भित्तर धकेलली । सानल चाउरेक पिठाके छोटछोट ढेल्की बनैटी हातमे रोटी बनाइ लग्ली । कराहीके तेल ढिकलपाछे उहाँ हातमे रोटी बनैटी तेलमे तेलपौर रोटी डरली । उहाँ चार सोरै (सोरठोके एक सोरै) तेलपौर रोटी बनैली । रोटी बनाके भान्सा घरमे ढरली ।

उहाँ सब काम ओरवाके लहैली । लहाके अइली । लाल सारी, हरियर चुरिया ओ लाल गुरिया घल्ली । कपाल चोँचे लग्ली । ऐना हेरटी बीचमे लम्मा सेंदुर डरली । सिउँँदोभर लाल सेन्दुर लगैलिन् । निधारमे कलेजी रङके गुलियार टीका लगैलिन् । फेन ऐना हेरलिन् । उहाँ अपनहे सुन्दर देखली । श्रृंगारके काम ओरुवाके पिलेटमे एक डरुवा खिर ओ एकठो तेलपौर रोटी लेली । अप्ने खाइ बैठ्ली । उहाँहे खिर तित लागल रहे, मने उहिसे तित उहाँहे तेलपौर रोटी लागल । उहाँ दुई कौरा बाहेक ढेर खाइ नैसेक्ली । खिरमे दुध ओ चिनी डारल ओरसे खिर कम तित लागल, मने तेलपौर रोटी (तेलमे पकाइल रोटी) खैही नैसेक्ना तित रहे ।

उहाँ मनमने सोचली, धान पानीमे भिजके ढुसी परल ओरसे उ चाउरसे बनल खिर ओ रोटी तित हुइल हुइ । सनेश तयार रहे मने तित । यी बाट उहाँक् गोसिया ओ उहाँ बाहेक किहुहे पता नैरहे । अन्तिम अवस्थामे का करही उहाँ ? उहाँ सोचली, टमान आफन्त ओ छिमेकीहुक्रे सनेश डेठैं । छिमेकी ओ आफन्तहुकनके सनेशके भिडमे यी तित सनेश डेलेसे तित रोटी ओ खिर कोकर हो कहिके पत्ता लगाइ कोइ नैसेकी । औरे उपाय फेन नैरहे उहाँसँग । सनेश पाकसेकल रहे ।

उहाँ खोरियामे खिर ओ प्लास्टिकके झोलामे रोटी ढरली । खिर ओ रोटी कागजके काटुनमे ढरके बँढ्ली । उहाँ अपन सारीके आँचलामे ५० रुप्याँ बँढ्ली । पस्ना पोछ्ना छोट रुमाल बिटोरके हातमे लेली । बाटा चप्पल घल्ली । निधार छोप्ना मेरिक घुम्टो ओह्रली । सनेशके काटुन कपारमे बोक्ली । नेंग्टी फौगनीके घर गिली । फौगनीके घर पुगेबेर सबजाने ट्रयाक्टरमे सनेशके पोका ढरसेक्ले रहिट । भुटिया हतारमे कपारमे बोकल सनेशके काटुन ट्रयाक्टरमे ढरली । सबके सनेशके पोकामे उहाँक खिर ओ रोटीके पोका मिलल । कौन केकर सनेशके पोका रहे कोइ पता लगाइ नैसेकल । उहाँ सनेशके पोका ट्रयाक्टरमे ढरके ढुक्क हुइली । लम्मा सास तन्ली ।

सक्कु छिमेकी ओ आफन्त महिलाहुक्रे मिलके फौगनीके पटुहियाहे पठाइ गिलैं । भुटिया फेन गिली । डुल्हनियँक लैहर पुगटसम रात हुगिल रहे । डुल्हीहे पठाइ गिल छिमेकी ओ आफन्त महिलाहुक्रे एक घर रहिट । सनेश औरे घरमे ढरले रहिट डुल्हीक बाबाडाई । कोइ केक्रे सनेश देखे नैपाइल । रात, पुठाइ आइल पाहुनाहुकनहे खाना खुवैनासे आघे सबजे नानल सनेश ओ टिना खाइ डेलैं । खाइ डेहल सनेश, रसभरी, दही, बुनिया, खजा, जेरी, तेलपौर रोटी, मुङ्वा ओ खिर रहे । सबके सनेश ठिके रहे, मने भुटियाके खिर ओ रोटी तित लागके कोइ खाइ नैसेकल । सबजाने कहटहिट, ‘छि ! के अइसिन तित सनेश डेहल ? रोटी ओ खिरमे का मिलाइल हुइ ?’ सबजे पालिकपाला कहे लग्लैं, ‘मै, जेरी, मै रसभरी, मै खजा सनेश डेले बटुँ ।’ ‘टे तित खिर ओ रोटी केकर सनेश हो ?’ टोलक जेठानी भुटियाओर हेरके कली । अपन पोल खुली कहिके भुटियाहे डर लागल । उहाँ तुरुन्ते झुठ बोल्टी कली, ‘मै जेरी सनेश डेनु । महिन का पता तित खिर ओ रोटी केकर हो ?’ टोलके देउरानी पर्ना कहली, ‘घर लौटलपाछे तित खिर ओ रोटी केकर डेहल हो, मै पत्ता लगाके छोरम ।’

देउरानीके बाट सुनके भुटियाके निधारमे चिपचिप पसना आइल । हातमे बोकल रुमालसे उ पसना पो लग्ली । भुटियाहे पसिना पोछट देखके टोलके नन्द परुइया खिजझ्वाके कहली, ‘ए भुटिया भौनी ! तित खिर ओ रोटी टोहान पहुरा हो कि का ? टबे टुहिनहे पसना आइल ?’ उहाँ अकमकाके नन्दहे खिजझ्वाइटी जवाफ लौटैली, ‘छि ! मोर सनेश नैहो उ । ए बाबु ! उ तित खिर ओ रोटी टोहारे सनेश हुइ ।’ टोलके नन्द उहाँक बाट सुनके शानसे कली, ‘मोर रसभरी सनेश रहे ।’ भुटिया ओ टोलके नन्दके बाट सुनके सबजाने हाँसे लग्लैं । भुटिया फेन हाँसे लग्ली । मने भुटियाके हाँसी संकोच ओ डरसे भरल रहे । सब महिलाहुक्रे घर उजरना हस हँस्लैं । महिलाहुँकनके हाहाहाहा ओ हिहिहिहि के आवाज किल निकरटी रहे । तित खिर ओ तेलऔर रोटी केकर सनेश रहे कोइ पत्ता लगाइ नैसेकल ।
मुना चौधरी
लेखक दुलारी उपन्यासके लेखक हुइटी

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