करम

खिस्सा / बट्कुही ११ जेष्ठ २०७८, मंगलवार Hits : 384
करम

एक कमैया रहए । बोके किसन्मा अपन खेत टिकरा बोहडा नापक दइ । कमैयक खेतमे सालौक सेरा, हथिया रब्बि खाए जामए । तओ एक दिन कमैया अपन किसन्मासे कहि, मिर खेतमे सालौक जानबर रब्बि खाएजात हए । मए जा टिकरा न लेमङ्गो खेतके बिचमे बोहडा लेमङ्गो । किसन्मा कमैयाके अपन खेतके बिचमे बोहडा नापक दइ । बो साल बिचमे खाइगए । अब कमैया सोचत हए । जा साल रब्बि बिचमे खाइगए । अब गुरू महराज थौरी पुछन जामओ । कमैया गुरू महराज थौरी पुछन जात हए । कमैया गुरू महराज थिन पुछत हए । गुरू महराज जितय मिर किसन्मा मोके बोहडा देत हए उतय जानबर रब्बि खाएजात हए । तव गुरू कहि, बेटा तिर करममे नैया तबही खाए जातहए । कमैया फिरसे पुछत हए कि मए करम कहाँ पाँओ रु गुरू कहि, चलोजैए बो समुन्दरके टापुमें । हुँवा तिर करम सोत हुइहए । हुँवा जा जगान तओ तिर करम खुलैगो ।

कमैया अपन किसन्मासे बिदाबारी लै और एक लठ्ठ लैके चलोहए करमके ढुडन । जाते जाते डगरमे एक रूखा मिलो । रूखा कहि, भैया कहाँ जात हए घामुमे एक घरि सैँताले । तव कमैया कहि, मए अपन करमके ढुडन जात हओ आत पेति सैँतामङ्गो । रूखा कहि, ठिक हए जा । कमैया फिर चल्देत हए । चल्ते चल्ते डगरमे घोडा मिलो । घोडा पुछि भैया कहाँ जात हए रु कमैया कहि मए अपन करमके ढुडन जात हओ मिर करम समुन्दरके टापुमे सोन डटो हए बोके जगान जात हओ । घोडा कहि, अहँ जा तव । फिर कमैया चल्देत हए । डगरमे एक कन्या मिलत हए । बो कमैयासे पुछत हए, तए कहाँ जातहए । कमैया फिरसे जबाफ देत हए कि, मिर करम समुन्दरके टापुमे सोन डटो हए मए बोके जगान जानडटो हओ । कमैयाके बात सुनके कन्या कहत हए, अहँ जा तव ।

कमैया जाते जाते समुन्दर किनारे पुगो हए । हुँवा जाएके देखत हए त करम सोन डटो हए । कमैया जाएके करमके दुइ लठ्ठ चट्काइ हए । तव करम उठो हए । कमैया कहि, तए हिँया का करन डटो हए चल हुँवा । करम अग्गु अग्गु चलो और कमैया पिछु पिछु चलो हए । आत आत डगरमे जौन कन्यासे कमैया मिलो रहए बोके अपन बैयर बनात हए । आत आत डगरमे घोडा मिलो बहे घोडाके संग लियात हए । जौन रूखा तरे सैतात हए बो रूखाके जरमे सोनो चाँदी भठो होत हए बो सोनो चाँदी सिकन भर लैके घरे आ जातहए । कमैयाके करम खुल्जात हए ।

लक्ष्मी राना
कैलारी(९ गदरिया

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