दिन के एल्हो मेल्हो, रातके जोनहियाँँ लेके सुकहुन सुखवैना

थारु समाज के बोलीबचन मे प्रयोग हुइति आइल धेउरे कहकुत मनसे एकथो यी फेन होवै ।

जव समय रहना ते यहोर ओहोर करना,घुम्ना, काम करेक पता नै पैना , जव उ काम के समय आरैना तव हडबड हडबड करे जैना,जैसिक हुइलेसे फेन ओकर वैकल्पिक डगर खोजके फेन उ काम ओरवाइ खोज्ना ठिक ओहे समय मे दोसर जे यि कहकुत कहे सेकथै। “दिन के एल्हो मेल्हो, रातके जोनहियाँँ लेके सुकहुन सुखवैना ”

लेखक:- बिना चौधरी

जनआवाजको टिप्पणीहरू

पाछेक साहित्य

‘डुटिया’ ह्यारबेर

जब मनै इ ढरटिम पहिला पैला ट्याकट टबसे वाकर जिनगि जिना संघर्स सुरु हुइट । आपन जिनगि जियक लाग संघर्स कर भिरठ् । संघर्स कर्ना क्रम म समय ओ परिस्ठिटि लेख वाकर


पुनाराम कर्याबरिक्का

गजल

का कमि रहे हेर्ना उ नजर भुलाडेलो ।साँझके सिटरैना उ नहर भुलाडेलो । दुई मुटुके मिलन हुइना गुरही चोकमे,मोर घरे ओर अइना उ डगर भुलाडेलो । टँु मोर मैया प्रेमके बहियाँमे


विश्वदेव चौधरी

गजल

जहर डंगौराजान पहिचान, मनैनके जवानी हो ।जिन्गी सँचमे, समुन्डरके पानी हो । मन लग्ना पिना, करठै बहाना मनो,टेन्सनमे खैना पिना, केकरो बानी हो । छोरना बा सब, आइ जब


जहर डंगौरा