अपन खुन पस्नासे सिंच्लो डाइ

अपन खुन पस्नासे सिंच्लो डाइ

कविता

दिपक चौधरी असीम

अपन खुन पस्नासे सिंच्लो डाइ
नौ नौ महिना अपन कोखमे पल्लो डाइ
अपन अंग अंग टुर्के
रकटके आँस रोके
भिष्मा पिताके जसिन कुरुक्षेत्रमे टिरके
बिस्टरामे सुटल
पिरा डुखाइके महसुस कर्टि
यि प्राकृतिक डुनियाँ डेखैलो डाइ
अपन खुन पस्नासे सिंच्लो डाइ ।

जब धर्तीम् आके चिल्लैनु
कहाँ आगैनु
एहोंर ओहोंर हेर्ना कोसिस कर्नु
अपनहे टोहाँर कोनम् पैनु
असिन लागल महिन
धेर्तीम् नाही मै स्वर्गम् आगिनु
हेर्टि रैह्गिनु टोहाँर उ सुरट
जेमने मै अपन भगवान् पैनु
मोर हाँठ, माँठ चुम्टि महिन मैंयाँ करलो
अपन खुन पस्नासे सिंच्लो डाइ ।

मोर रुवाइमे मोर बोलि सुन्लो
महिन चाहल चिजके अभास कैलो
दुधके रुपमे अपन खुन पिवाके
भुख्ले पियस्ले कामसे डट्करल आके
अपन जिउक् ख्याल नैकर्के
डेंहँक् अपन मुटुक् टुक्रा समझ्के
मोर स्याहार सुसार करलो डाइ
अपन खुन पस्नासे सिंच्लो डाइ ।

नेंगे सिखाइबेर हाँठेक् अंगरी पकर्के
गिरल बेलम् भुँइयम्से उठाके
एक ठप्पर महिन मारके
मोरसे ढेर रोके
सुफ्लाइक् लग अपन छाटिम् लगाके
दुख सहेक्, संघर्ष करेक्
हरेक मोरमे हाँसके जिएक् सिखैलो डाइ
आपन खुन पस्नासे सिंच्लो डाइ ।

कैलारी गाउँपालिका–२ बसौटी, कैलाली ।
हाल– महाराष्ट्र पुना भारत ।

दिपक चौधरी असीम

दिपक चौधरी असीम

जनआवाजको टिप्पणीहरू

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