कविता

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रामबिनर चौधरी

जिन्गी बहुत सुग्घर बा मनो जिए नै आइठ ।
हर चिजमे नशा बा मनो पिए नै आइठ ।।

सब जाने मोर बिना जि लेठ ।
बस महिने केकरो बिना जिए नै आइठ ।

जिन्गी फेन उहिने अजमाइठ ।
जिही हर मोडमे जिए आइठ ।।

कुछ पाके टे कोइ फेन मुस्कुरा लेठैं ।
मने सब जहन असिन मौका नै आइठ ।

कोइ फेन नाता हे सच्चा दिलसे निभाइ ।
यी जिन्गी फेन से वापस नै आइठ ।।

असल मे जिन्गी ओइनहे जिठैं ।
जिहीन सब कुछ गुमाके मुस्कुराइ आइठ ।
कैलाली

रामबिनर चौधरी

रामबिनर चौधरी

जनआवाजको टिप्पणीहरू

पाछेक साहित्य

‘डुटिया’ ह्यारबेर

जब मनै इ ढरटिम पहिला पैला ट्याकट टबसे वाकर जिनगि जिना संघर्स सुरु हुइट । आपन जिनगि जियक लाग संघर्स कर भिरठ् । संघर्स कर्ना क्रम म समय ओ परिस्ठिटि लेख वाकर


पुनाराम कर्याबरिक्का

गजल

का कमि रहे हेर्ना उ नजर भुलाडेलो ।साँझके सिटरैना उ नहर भुलाडेलो । दुई मुटुके मिलन हुइना गुरही चोकमे,मोर घरे ओर अइना उ डगर भुलाडेलो । टँु मोर मैया प्रेमके बहियाँमे


विश्वदेव चौधरी

गजल

जहर डंगौराजान पहिचान, मनैनके जवानी हो ।जिन्गी सँचमे, समुन्डरके पानी हो । मन लग्ना पिना, करठै बहाना मनो,टेन्सनमे खैना पिना, केकरो बानी हो । छोरना बा सब, आइ जब


जहर डंगौरा