कहाँ गैलो टुँ

कहाँ गैलो टुँ |
सुर्र सुर्र बयालके पता पैनु |
घुर्र घुर्र नाक बाजतह |
ओर्हल गुद्री फेकाके |
अपन असली रुप देखाके |
मै पस्ना पसिन हुइनु |
कहाँ गैलो टुँ |

उज्जर उज्जर लुग्गा हसक |
कर्या कर्या लम्मा झोंटी |
उहो पात्तिर पात्तिर हाथगोरा |
लाल लाल धेबर |
गोर्हर गोर्हर गाल |
जिउ लल्चैतिक उहे पटली पुथ्था |
कहाँ गैलो टुँ |

बाह्र एक बजेक रातम |
कुछु नै रह हाथम |
बयाल हसक आइत देख्नु |
उठके उलित बिलित हेर्नु |
आंजर पांजर जम्म सुनसान रह |
आधा लोतिया पानि पिनु |
सपना हो कि बिपना हो अंग्री कचर्नु |
कहाँ गैलो टुँ |

रातके खेल अईठो |
बात बातम महिन घोर अईठो |
कबु लघ्घु कबु दुर भगैथो |
छातीभर चप्ताके |
गुद्री दरी सब उस्ताके |
अपन संग महिन खुस्ताके |
जब होस् आइल त |
कहाँ गैलो टुँ |

सुमित रत्गैंयाँ

रैकवार बिचवा १ मजगैं कन्चनपुर्

सुमित रत्गैंयाँ

जनाअवजको टिप्पणीहरू

पाछेक साहित्य

कपिलवस्तुहे चिठ्ठी

प्यारी कपिलवस्तु ! ढेर ढेर सम्झना ओ डन्डुर डन्डुर मैया बा कैलालीक् तरफसे । आधा बरस होगैल कुछ हाल खबर नै पठैले हुइटो । कहाँ हेरा गैलो कि कहोंरो व्यस्त बटो कि


सागर कुश्मी “संगत”

जय राम जी की । तोहार प्यारा कैलाली सागर कुश्मी “संगत”

दो नम्बरी भरभट्टामे एक दिन

हुईना टे शहर बजार ओर दो नम्बरी गाडी नाई चल्लेसे फेन गाउँघर ओर अभिनसम लुकछुपके यि मेरिक गाडी चलल् देखजाईठ् । अकसर कैके यी मेरिक भरभट्टा गाउँघर ओर बहुट कुदट्


– राम दहित

– राम दहित

डक्टरुवा ओ बिरम्ह्या

एकठो बेराम मनैया डक्टरुवाक थन गइल,उ मनैयाहे रहिस हेग्नी पकर्ले !डक्टरुवा : का हुईथ ?बिरम्ह्या : महिन हे हेग्नी पकेर्ले बा हजुर ।डक्टरुवा : कैसिन हेगाइथ ?बिरम्ह्या


- सुबास चौधरी

- सुबास चौधरी