गजल

गजल


पट्ठरहे खुशी पारक लाग फुला चह्राइक् परठ ।
ना बोलठ् ना चलठ टबफें शिर झुकाइक् परठ ।

स्वार्थी समाज स्वार्थी संसार अस्टही बा यहाँ,
केकरो चोटमे अपन मन काहे रुवाइक् परठ् ।

कबु मिलन कबु बिछोर यी कैसिन रीत हो इ,
कसम खाके जोरल नाँट फेन छुटाइक् परठ् ।

मिलन बिछोर हुइना यी भाग्यके खेल हो हेरो,
समय आइठ् टो खाइल कसम टुटाइक् परठ् ।

यहाँ सिर्हन्नी भिजगैल आँखीक् आँस सुखगैल,
टुहिन बिदाइ करबेर हिम्मतफे जुटाइक् परठ् ।
वसन्त चौधरी
शुक्लाफाँटा- ३ जोन्हाँपुर, कंचनपुर

वसन्त चौधरी

वसन्त चौधरी

जनआवाजको टिप्पणीहरू

पाछेक साहित्य

हे भगवान ओइनहे ना परच्वाएउ

पहिले टे सिरिजल, जलथल ढरटी ।सिरिजीटे गइलाहो कुसकही डाभ ।।हुइनाटे मै गल्ती फेन हो सेक्ठुँ । लकिन मही महा अचम्भ लागठ कि यी पृथ्वीके उत्पत्तीके पुरा इतिहास


भाष्कर देव चौधरी

समानता, शिक्षा ओ रोटी

मनै मुअक टे जर्मलक नै हो, बेन जियक टे जर्मलक हो । प्याट केल पालक टे जिना टे संकिर्ण वा घिनलक्टीक विचार हो । अ‍ैसिन घिन लक्टीक विचारह ठाउँ देलसे मनै उन्नतिम


शत्रुधन गोचाली

अपन लइकन सु–संस्कारवान बनाएक जरुरी

समयके गति अपन धुरीमे बहुट तेजीसे आगे बढतबा । एके केउनाई रोक पाई समयके गतिके साथ साथे हर एक चीजमे बहट तेजीसे परिवर्तन हो रहलबा । पहिलेक समय आउर अबके समयमे बहुट


श्याम सिटी