गजल

गजल

जिन्गी भर महिन टुँ अस्टेके मैंयाँ कर्बो का ?
हरदम अपन मन मस्तिष्कमे सजाके ढर्बो का ?

कोइ टोहाँर आघे मोर बारेमे भला बुरा कहिटो,
हिम्मत जुटाके अकेल्ही उहिनसे लर्बो का ?

मोरिक ठन साँस बाहेक कुछ नाइ रैहजाइ टो,
फेरसे मोर उज्रल जिन्गीमे खुसी भर्बो का ?

कबु काल बिस्राके मै गलत डगर नेंगम कलेसे,
सहि समयमे मोरिक बिग्रल बानी सँवर्बो का ?
निर्मल चौधरी (असफल यात्री)
जानकी –५, कैलाली

निर्मल चौधरी

निर्मल चौधरी

जनआवाजको टिप्पणीहरू

पाछेक साहित्य

‘डुटिया’ ह्यारबेर

जब मनै इ ढरटिम पहिला पैला ट्याकट टबसे वाकर जिनगि जिना संघर्स सुरु हुइट । आपन जिनगि जियक लाग संघर्स कर भिरठ् । संघर्स कर्ना क्रम म समय ओ परिस्ठिटि लेख वाकर


पुनाराम कर्याबरिक्का

गजल

का कमि रहे हेर्ना उ नजर भुलाडेलो ।साँझके सिटरैना उ नहर भुलाडेलो । दुई मुटुके मिलन हुइना गुरही चोकमे,मोर घरे ओर अइना उ डगर भुलाडेलो । टँु मोर मैया प्रेमके बहियाँमे


विश्वदेव चौधरी

गजल

जहर डंगौराजान पहिचान, मनैनके जवानी हो ।जिन्गी सँचमे, समुन्डरके पानी हो । मन लग्ना पिना, करठै बहाना मनो,टेन्सनमे खैना पिना, केकरो बानी हो । छोरना बा सब, आइ जब


जहर डंगौरा