चली गोचा संगे परगा बर्हाइ

चली गोचा संगे परगा बर्हाइ

कविता
चली गोचा संगे परगा बर्हाइ

गोचा टुँ ओ मै
मुस्कान के बियाँ छिट्के
रात दिन पस्ना चुहाके
हिमालसे गोचाली भिंरके
पहारसे मित जोरके
तराईके फँटुवामे
चली गोचा संगे परगा बर्हाइ

जल स्रोतके खानी हिमालमे बा
खनिज पदार्थके स्रोत पहारमे बा
औद्योगिक स्रोत तराईके मैदानमे बा
अत्रा रटिरटि चिमचाम काहे
चली गोचा संगे परगा बर्हाइ ।

बार्होमास बहना लडियामेसे
बिजली निकारी
चारकोसे हरियर बनुवँमसे
जरिबुटी दवाइ बनाइ
समथर तराईक् फँटुवामे
पस्ना चुहाके सोन फराइ
चली गोचा संगे परगा बर्हाइ ।

प्रकृतिसे जोरल हमार भविष्य सिंगारी
गेंडा, मखमल, डौना, बेबरी
फुलक् टेंम्ह्रीहस सजाके
फरछुवार बनाइ जिन्गीक डगर
चली गोचा संगे परगा बर्हाइ ।

टोहाँर ओ मोर हाँठ गोरा खियाके
मेहनतके पस्ना चुहाके
आउ संघारी संगे सहकार्य करि
हिमालहस ढेंग सपना बनाके
चली गोचा संगे परगा बर्हाइ ।

परिश्रमके डिया बारके
कन्ढम् हाँठ ढारके
जोन्हियाँहस ओजरार छिटिक्के
टोरैंयाँहस चम्कटी रहि हर दिन
ओ ओठ भर मुस्की भरटी रहि
टुँ हिमाली, टुँ पहारी, मै तराई
चलि गोचा संगे परगा बर्हाइ ।
सागर कुश्मी `संगत´
कैलारी गाउँपालिका-८ डख्खिन टेंर्ही, कैलाली

सागर कुश्मी `संगत´

कविता

सागर कुश्मी `संगत´

जनआवाजको टिप्पणीहरू

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