मुक्तक

मुक्तक


गोझुम दाम रहट्सम् साठ मिलठ् ।
गिलासम् मड रहट्सम् बात मिलठ् ।
धन दौलत बंगलागारी रहुइयनके यहाँ,
जुनी रहट्सम् जोबनके हाँठ मिलठ् ।
वसन्त चौधरी
कंचनपुर

वसन्त चौधरी

वसन्त चौधरी

जनआवाजको टिप्पणीहरू

पाछेक साहित्य

हे भगवान ओइनहे ना परच्वाएउ

पहिले टे सिरिजल, जलथल ढरटी ।सिरिजीटे गइलाहो कुसकही डाभ ।।हुइनाटे मै गल्ती फेन हो सेक्ठुँ । लकिन मही महा अचम्भ लागठ कि यी पृथ्वीके उत्पत्तीके पुरा इतिहास


भाष्कर देव चौधरी

समानता, शिक्षा ओ रोटी

मनै मुअक टे जर्मलक नै हो, बेन जियक टे जर्मलक हो । प्याट केल पालक टे जिना टे संकिर्ण वा घिनलक्टीक विचार हो । अ‍ैसिन घिन लक्टीक विचारह ठाउँ देलसे मनै उन्नतिम


शत्रुधन गोचाली

अपन लइकन सु–संस्कारवान बनाएक जरुरी

समयके गति अपन धुरीमे बहुट तेजीसे आगे बढतबा । एके केउनाई रोक पाई समयके गतिके साथ साथे हर एक चीजमे बहट तेजीसे परिवर्तन हो रहलबा । पहिलेक समय आउर अबके समयमे बहुट


श्याम सिटी